योग्यता
जैसा की सभी जानते हैं कि भगवान की उपासना के उद्देश्य सभी के एक जैसे नहीं है। लेकिन उस परम तत्व की पूजा में सभी का प्रयास यही होता है कि सबसे अच्छी, पवित्र वस्तु ही प्रभु को निवेदन करें। क्योंकि प्रभु को तो सबसे उत्तम वस्तु ही अर्पण की जाती है। खराब नहीं। खराब वस्तु भगवान को नहीं अर्पित की जाती।
वैसे ही जो व्यक्ति साधक है जिसका उद्देश्य सिर्फ भगवान को पाना है। उसे अपने आप को प्रभु के योग्य बनाना होगा। अपने व्यक्तित्व को शुद्ध बनाना होगा जैसे गुलाब के फूल के चारो ओर काटें होते हैं वैसे ही हमारे व्यक्तित्व मे भी अनेक काटें होते हैं,उन्हें हटाना होगा तभी हम भगवान को निवेदित होने के लायक होगे।
व्यक्तित्व के ये काटें है- राग, द्वेष, ईर्ष्या, भय, क्रोध, काम इत्यादि।जहाँ दो से चार इंसान साथ रहते हैं वहां कहासुनी होती ही रहती है। और हर व्यक्ति जीतना चाहता है हर व्यक्ति चाहता है कि में जीतू। लेकिन इस जीत से क्या मिल पाता है। केवल अभिमान में ही वृद्धि होती है और कुछ नहीं, मन से ये हार, जीत, अपना पराया का भाव ही निकल जाये, निंदा- प्रशंसा से कोई फर्क़ ना पड़े तो मन अपने आप ही शुद्ध होने लगता है और भजन में मन भी तभी लगता है।
हार को हरि मिले, जीता जम के द्वार,
कबीरा तू हरा भला, जीतन दे संसार।
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