भावना
संसार में लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी भगवान को पूजते है। सबकी पूजने की पद्धति अलग अलग हो सकती है। सबकी पूजा के उद्धेश्य भी अलग अलग होते हैं। मगर जिसे भी हम पूजते है अगर वो भगवान है तो उसे अपने पूजने वाले से केवल भावना अपेक्षित होती है।
कुछ इंसान जिन्हें विषय जीव कहा जाए तो ठीक ही होगा ऐसे इंसानो के लिए भक्ति करना मात्र एक चिकित्सा विधि है। जेसे अलग अलग रोग के लिए अलग अलग दवा होती है वेसे ही ये लोग अपनी अनेकों मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अनेकों विधि से पूजा करते हैं। कभी किसी इच्छा के लिए नारियल, कभी फल, फूल, कभी कोई सा पाठ करना, कभी तेल के दिए जलाना। इस इच्छा की पूर्ति के लिए ऐसा करना, उस इच्छा के लिए वैसा करना जैसी इच्छा वैसी सामाग्री व पूजा विधि बाकी भावना नाम की चीज क्या होती है इससे उनका कोई वास्ता नहीं।
शास्त्र कहते हैं कि जो व्यक्ति जिस रूप में, भगवान को देखता है भगवान उसे वेसे ही नजर आते हैं। योगी को योगेश्वर, भक्त को भगवान, माँ को पुत्र, सखा को सखा आदि। जाहिर है फिर ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनके लिए पूजा एक चिकित्सा है भगवान डॉक्टर के ही रूप में नजर आते हैं। रोगी लायक हुआ तो ठीक, वरना जय श्री राम।
साधक के लिए आराधना रसायन है, सिद्ध के लिए अमृत। बिना भावना कैसी भक्ति। यदि इंसान पूर्ण भक्ति भाव से युक्त होकर भगवान की आराधना करे तो उसका नजरिया ही इतना विशुद्ध हो जाएगा कि उसे यह ज्ञात हो जाएगा कि उसे भगवान से क्या माँगना चाहिए और क्या नहीं। उसके ज्ञान चक्षु खुल जायेगे और वह जानेगा कि उसे प्रभु के पीछे जाना हैं प्रभुता के पीछे नहीं, प्रभु ही जब मिल जायेगे तो प्रभुता तो अपने आप ही आ जाएगी।

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