समर्पण

 इस दुनिया में हर व्यक्ति अपनी जिंदगी की भाग-दौड़ में लगा है। हर स्तर पर चाहे घर हो, स्कूल हो या व्यापार हो, सब जगह प्रतियोगिता चल रही हैं जिंदगी हार जीत ही बन कर रह गई है। इंसान के भाव, विचार, उद्देश्य, रास्ते सभी बड़े विचित्र हो गए हैं। 

समर्पण की भावना कहीं नहीं दिखाई देती है। समर्पण क्या है पहले तो यही जान ले कोई इंसान किसी दूसरे इंसान को कुछ देता है या किसी प्रकार की सहायता करता है तो इसके पीछे क्या कारण होता या तो पुण्य कमाने के लिए या नाम कमाने के लिए या किसी कार्य के सिद्धी के लिए। यहां अगर "मैं " है  मतलब "मैं " दे रहा हूं या "मैं " कर रहा हूं तो यहां समर्पण नहीं है। और जहाँ समर्पण नहीं है वो सेवा सेवा भी नहीं है। सबसे पहले तो समर्पण भगवान के प्रति करो। यदि भगवान में अटूट विश्वास है तो समर्पण पूर्ण समर्पण है। और पूर्ण समर्पण के पश्चात्‌ व्यक्ति मुक्त हो जाता है जीवन की चिंताओं से। 

कोई भी काम करो मन में यही भावना होनी चाहिए कि भगवान ही कर रहें हैं मुझ में ये काम करने की शक्ति देने वाला ये कोन है , भगवान ही तो है तो मैं कोन हूं ये करने वाला। भगवान ही सब काम कर रहे हैं।  और जिसके लिए कर रहे हैं वो भी भगवान ही है। हर काम भगवान को समर्पित करते हुए अच्छे कर्म करते हुए, कर्म को सेवा बनाए।  

यही समर्पण है। 

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