अनुकूलता
हर इंसान की ख्वाहिश होती है कि जो वो चाहे जेसा भी चाहे वैसा ही मिल जाए। सब कुछ हमारी जिंदगी में बस हमारे ही अनुसार हो। और अगर ऐसा हो तो क्या बात है वरना हम तो विपरित परिस्थितियां देखते ही घबरा जाते हैं। ना जाने कितना कोसते है भाग्य को और भाग्य विधाता को।
अनुकूलता और प्रतिकूलता तो जिन्दगी के हिस्से है, खेर सच तो यह है कि ये दोनों ही जिंदगी में बहुत जरूरी है खासकर भक्त को तो भगवान ज्यादा अनुकूलता देता नहीं है। क्योंकि ज्यादा सुख, ज्यादा आराम प्रमाद लाता है, उन्माद लाता है जो भक्त को भगवान से दूर संसार के करीब लाता है जेसे गुलाब के फूल को भगवान काटो से घिरा हुआ रखते हैं ताकि आसानी से इसे कोई तोड़ ना सके।
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