स्थायित्व

 ये संसार नश्वर है इस संसार की हर वस्तु, हर जीव और मनुष्य सभी नश्वर है। मृत्यु के बाद इंसान सभी कुछ यहां तक कि अपना शरीर भी छोड़कर चला जाता है। फिर भी हम एक दूसरे से इतना मोह पैदा कर लेते है। और तो ओर हम कभी कभी तो छोटी छोटी सी मामूली चीजों से भी मोह कर लेते है।

जहां हमारा बचपन गुजरा है उस स्थान से मोह, कभी काम मे लेकर छोड़ी हुई चीजें से मोह, पुरानी यादों का मोह, रिश्तेदारों का मोह, दोस्तों का मोह, वगरह। जैसे जैसे इंसान अपनी जिंदगी में आगे बढ़ता है कुछ धीरे धीरे पीछे छूटता जाता है। बचपन में परिवार में जो साथ होते है बड़े होने पर हर एक का अपना परिवार बन जाता है। कोई छोड़कर चला जाता है तो कोई दूसरा छोड़कर अपने परिवार में आ जाता है।


समय के साथ सब बदलता है। कुछ भी स्थायी नहीं रहता है। मां बाप का साथ एक समय तक है भाई बहन का भी साथ एक समय तक है। और पति पत्नि का साथ भी ज्यादा से ज्यादा जिंदा रहने तक ही हो सकता है। बेटा बेटी भी कब तक साथ हो सकते है  

जिंदगी में स्थायित्व कहीं नहीं है कोई भी हमेशा साथ रहने वाला नहीं है फिर ये मोह क्यूं, ये लगाव क्यूं जो दुख का कारण है और निश्चित दुख ही देने वाला है। फर्ज होते है हमारे रिश्तों के प्रति, तो इन्हें फर्ज समझकर ही सच्चे दिल से निभाइये, मगर जरूरत से ज्यादा लगाव दुखदायी है। मृत्यु से पहले और मृत्यु के बाद जो हमेशा हमारे साथ रह सकता है। या जो कि हमेशा हमारे साथ हो सकता है और जो स्थायी भी है वो है भगवान। फिर क्यों नहीं हम अपना सारा मोह, प्रेम, लगाव उसी ईश्वर से लगाए तो फिर दुख कभी हो ही ना।

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