सच
इंसान बहुत ही स्वार्थी प्राणी होता है। इंसान अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीना चाहता है। और वहीं करता है जो वो करना चाहता है। अगर इंसान अच्छे कर्म करता है तो वह बेहद खुश रहता है और सही भी है। और सन्तुष्टि भी तभी मिलती है। लेकिन अगर बुरे कर्म करता है। और जब बुरे कर्मो की सजा भुगतने का वक्त आता है तो खुद को निर्दोष मानकर सारा दोष, हालात, दशा, दूसरो पर या ईश्वर पर लगाता है।
क्यू करता है इंसान ऐसा, कर्म करे गलत खुद और इल्जाम औरों पर, इतना ही नहीं कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि गलत इंसान और उसके पक्षपाती रिश्तेदार भी अपने आप को सही मानते हुए हर तरह की कोशिश करते है। दोषी व्यक्ति को बचाने के लिए।
आश्चर्य तो देखिए भगवान से भी ये लोग ये उम्मीद रखते है कि दोषी व्यक्ति को सजा ना मिले और उसे भगवान बचाए। क्यू भगवान का वो खास है क्या? भगवान के लिए सब बराबर है। भगवान कभी भेदभाव नहीं करता है। वो हमेशा न्याय करता है। तभी तो वो भगवान है। और अगर कोई ये सोचता है कि तरह-तरह के उपाय करने से दोषी या गुनहगार व्यक्ति को भगवान सजा नहीं देगा तो ये उसकी बहुत बड़ी मूर्खता है। गलती करो तो सजा भुगतने का भी साहस रखो। सजा भुगतने से दोष दूर हो जाते है। और सच्चे दिल से पश्चाताप करने से मन पवित्र हो जाता है और हो सकता है तब भगवान जरूर दया करे, यही एक उपाय है खुद के उध्दार का। समय रहते हुए सच को महसूस कर लो ये जिन्दगी दोबारा ना मिलेगी अगर जिन्दगी रहते ही सम्भल गए तो सब कुछ ठीक हो सकता है वरना तो सब खत्म है।
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