मन की गति
इस दुनिया में हर इंसान की कुछ न कुछ पाने की, कुछ न कुछ जीतने की इच्छा होती ही है। और शायद सब कुछ जीत पाने में इंसान सफल भी हो जाए मगर इस चंचल मन एवं बुध्दि को कोई नही जीत पाता है।
ये मन कितना शक्तिशाली है हम सदैव इसके वश में रहते है मगर ये हमारे वश में कभी नहीं चलता। एक पल में क्या से क्या सोच लेता है, एक पल में कहां से कहां पहुँच जाता है ये मन इसका कोई पार ही नहीं है। सोचिए हमारा कोई बहुत खास घर से कहीं दूर जा रहा होता है। या घर आ रहा होता है। तो जब तक वो अपनी जगह सुरक्षित पहुँच नहीं जाता हमारे मन में कितनी चिंताए घर कर लेती है। हालांकि हमारे चिंता करने से जो होने वाला है वो टल सकता और जो नहीं होने वाला है वो हो नहीं सकता फिर भी दुनिया भर की चिंता हम कर लेते है या यौं कहें कि चिंता करते नहीं चिंता हो जाती है हमारा कोई वश नहीं चलता है।
ऐसे ही मान लीजिए कोई व्यक्ति आकर हमसे ये कहे कि हमारा भविष्य बहुत ही अच्छा होगा, हमारे भविष्य मे बहुत शुभ ही शुभ होने वाला है तो हमारा मन तुरंत ही उस पर विश्वास कर लेता है उस व्यक्ति को हम बिलकुल सही मान लेते है। और अगर कोई बहुत ज्ञानी पुरूष ये कह दे कि हमारे भविष्य में बहुत बुरा होने वाला है। कुछ अच्छा नहीं होने की सुनते है तो हम उस सिध्द पुरूष को ही गलत समझने लगते है कि ये कोई ज्ञानी नहीं है। इसको कोई भविष्य देखना नहीं आता इस तरह हमारा मन वहीं मानता है जो उसे मानना होता है।
इस मन की गति बड़ी विचित्र है। इसको कौन जीत पाया है। जिसने मन को जीत लिया या वश में कर लिया वही असली विजेता या सफल इंसान है।
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