शरीर और मन

 क्या किसी ने ये सोचा है कि आखिर यह शरीर क्या है और क्यों है? हम केवल इस शरीर को बनाए रखने में इसका लालन पालन करने में और यह कहे कि इसलिए ही जी रहे है और सब कुछ कर रहे है। हमारा ध्येय इस शरीर तक ही सिमट कर रह गया है। क्योंकि हम हमेशा इसी की आवश्यकताओं को पूरा करने में लगे रहते है। मन के बारे में सोचते तक नहीं है। बस शरीर संतुष्ट तो मन भी संतुष्ट, है ना! यहाँ मन से मतलब मन को सुधारने से है।

गहराई मे जाकर देखो इस शरीर के अंदर एक और शरीर है जिसे हम सूक्ष्म शरीर कह सकते है। आँख खोलने पर सब कुछ दिखाई देता है और आँख बंद करने पर हमे वो सब कुछ भी दिखाई देने लगता है जो हम खुली आँखों से नहीं देख पाते। करो आँखे बंद और देखो जो देखना चाहते हो दिख जाएगा।


आँखे तो बंद है फिर हमें जो दिखाई देता है वो कैसे और किससे दिखाई देता है, सोंचो। ये सूक्ष्म शरीर की आँखे है जिसकी देखने की सीमा का पार नहीं है। ऐसे ही इस सूक्ष्म शरीर की आवाज भी होती है, सुनने की ताकत भी होती है।

इस सूक्ष्म शरीर पर ज्यादा ध्यान दो मतलब अपने मन को शुध्द बनाओ, अच्छा सोंचो, अच्छा करो, अच्छा बोलो।

अपने ज्यादा से ज्यादा कोशिश अच्छा बनने मे करो जब सूक्ष्म शरीर मजबूत होगा तो स्थूल शरीर भी संवर ही जाएगा।

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